जंगल, भूमंडलीकरण और सहकार

साथियों,
कुछ दिनों पहले हमने ‘संपादकीय और विचार’ नाम से श्रृंखला शुरू की थी लेकिन हमने देखा कि हिंदी अख़बारों में कभी कभार अच्छे आलेख ढूँढने से नहीं मिलते. इसलिए हमने सोचा है कि समय समय पर चुनिन्दा पठनीय सामग्री आप तक पहुंचाते रहेंगे. आज तीन आलेख के लिंक आपको दे रहा हूँ. तीनों ही आलेख निबंध या सामान्य अध्ययन के दृष्टिकोण से पढ़े जाने योग्य हैं.

1. जंगल की दार्शनिक भावभूमि

लिंक- http://www.prabhatkhabar.com/news/columns/story/792101.html

(जंगल’ शब्द उच्चरित होते ही लोगों के मानस में एक नकारात्मक छवि उभरने लगती है, जंगल के बाशिंदे यानी ‘जंगली’. ‘जंगली’ विशेषण कभी भी सकारात्मक रूप में प्रयुक्त नहीं होता है. इस सोच ने आदिवासियों को लंबे समय तक मनुष्यता के पद से वंचित रखा. अब भी यह सोच उसी रूप में दिखाई देती है.)

2. भूमंडलीकरण और विषमता

लिंक- http://www.deshbandhu.co.in/article/5858/10/330#.VyLkNdJ97IU

(मंडलीकरण के वर्तमान दौर में आर्थिक विषमता की स्थिति क्या होगी? दो वर्ष पूर्व फ्रांसीसी अर्थशास्त्री टॉमस पिकेट्टी ने अपनी पुस्तक ‘कैपिटल इन द ट्वेंटी फस्र्ट सेंचुरी’ में पहली बार इस प्रश्न को जोरदार ढंग से उठाया था। उनका मानना था कि 1930 के दशक से 1970 के दशक तक आर्थिक विषमता की प्रवृत्ति घटने की थी मगर 1970 के दशक के बाद वह लगातार बढऩे लगी है। ऐसा क्यों हो रहा है?)

3. भारत-अमेरिका सहकार जरूरी

लिंक- http://www.prabhatkhabar.com/news/columns/story/786217.html

(आज का भारत 1950 के दशक वाला गुट निरपेक्ष देश नहीं, जिसका टकराव हर कदम पर शीतयुद्ध के युग में नव साम्राज्यवादी अमेरिका से होता था. नेहरू सरकार का रुझान समाजवादी आर्थिक विकास का था और यह स्वाभाविक था कि तत्कालीन सोवियत संघ के साथ हमारी आत्मीयता कहीं गहरी थी.)